गुरुवार, 16 नवंबर 2017

पहला चुम्बन


       
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 कुछ बातें वैसे ही याद रह जाती है जैसे किसी अच्छी होटल का खाना । बात अगर कही जाए तो दो लफ्ज़ में कही जा सकती है लेकिन बिना बेक ग्राउंड के उसे समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है । आयुष बिना कुछ सोचे समझे अपने कंधे पर एक बैग लादे, सितारा बस में चढ़ा । सारे रास्ते पूराने ख्यालों के पुलिंदे पलटता रहा जो उसे हर लाइन पर मुस्कुराने के लिए बाध्य कर रहे थे । पांच बजकर बीस मिनट पर आयुष नाका नम्बर पांच पर अपने सामान को थामे उतरा । निकट ही के एक रिश्तेदार के घर जाकर जो कि नाके की बगल वाली गली में था वहाँ अपना सामान रख दिया और मोबाइल में अपनी बर्थ की करेंट स्टेटस चेक करने के बाद फिर बाहर सड़क पर घुमने के लिए निकल गया ।
                    घूमते हुए जब वह चौराहे पर पहुंचा तो उसे याद आया कि शिवानी की कोचिंग क्लासेस इसी एरिया में पड़ती है । करीब पौने छः बजे तक वह ऐसे ही टहलता रहा मानो उसे किसी का इंतज़ार हो । उस चौराहे पर गुजरने वाली गाड़ियों की गिनती वह ऐसे करता रहा जैसे कोई बच्चा आसमान के तारे गिना करता है । लगभग लगभग सारे ही नम्बर और अजनबी चेहरों को देखते देखते उसे बीते दिनों में पहली बार लगा कि अनजाने में इंतजार कोई कैसे किया करता है जिसका अनुभव उसे आज के पहले नहीं था । आयुष अपनी लहराती नज़र हर चालीसवें सेकंड बांयी ओर से आने वाली सड़क पर घुमा रहा था जिसमें एक बड़ी स्टेशनरी और कुछ फल-सब्जियों के ठेले लगे हुए थे । वैसे हमें यह पता होना चाहिए कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, इंतजार कैसा भी हो बैचैन रहने वाला शख्स हर पल का हिसाब रखता है । इंतज़ार की इसी उधेड़बुन में सहसा उसने पाया कि एक जानी पहचानी शक्ल भीड़ से उसकी ओर आ रही है, किसी अच्छी चाय की दो चुस्की ले-सकने वाले वक़्त के बाद उसे शिवानी की स्पष्ट सूरत नज़र आई, सब कुछ वैसे ही ठहर गया जैसे बचपन में बरफ-पानी खेलते वक़्त डेनी के बरफ कहने पर ठहर जाया करता था । खैर, कुछ देर बाद शिवानी आयुष के करीब पहुँच गयी और उसकी आँखों में भी वही अप्रत्याशित इंतज़ार था जिसका उसे भी अब तक एहसास नहीं हुआ था । फिर खैरियत पूछने वाली फॉर्मेलिटी पूरी हो चुकने के बाद, और बातों का असल रूप सामने आने लगा । बहुत उखड़ी हुई सी सूरत थी दोनों की जैसे किसी ने कहा हो कल से ही एंड-सेमेस्टर का एग्जाम शुरू होने वाला है और उनकी तैयारी का प्रतिशत शून्य रहा हो ।

          जँहा वे दोनों खड़े थे पास ही एक मकान का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसकी आवाजों ने उन्हें डिस्टर्ब करना चाहा लेकिन आवाजें नाकाम हुई । अपनी बेसब्री की हालत बयान करने के बाद दोनों इस बात को लेकर हिचकिचा रहे थे कि पहल कौन करे, यंहा किस चीज़ की पहल की बात हो रही है उसे परिभाषित करना बेवकूफी ही होगी इसलिए रहने दिया जाये तो ज्यादा बेहतर होगा । शिवानी का ध्यान बार बार घड़ी की ओर था जो कि अपना स्वर्ण रूप लिए आयुष के हाथों की शोभा बड़ा रही थी । शिवानी ने समय देखने के बहाने आयुष का हाथ थामा तो आयुष ने उसे खिंचकर अपने गले लगा लिया, कितनी देर तक ? यह किसी को आज तक पता नहीं चला है और ना चलेगा । पहल वाले सवाल का जवाब अब तक उन्हें भी, आसपास वालों को भी और बाकियों को भी सहज ही मिल गया था, फिर शिवानी ने आयुष से वक़्त पूछा जो कि वह बताना नहीं चाह रहा था और इस वक़्त सबसे अच्छा किरदार निभाया घड़ी के सेल ने जो कि काफी समय पहले इस दुनिया को छोड़कर चला गया था और घड़ी 5 बजकर 45 मिनट दिखा रही थी । हमारी ज़िन्दगी कई मर्तबा हमारा साथ इतनी अच्छी तरह से निभाती है कि हम अचरज में पड़ जातें हैं और सोचते हैं कि साला सपना है या हकीक़त ।

                              शिवानी और आयुष उस निर्माण कार्य वाली बिल्डिंग से दूर निकलकर रोड पर आ गए, दोनों की इच्छा थी कि कुछ समय और बिताया जाये लेकिन नियति नहीं चाहती थी कि इनका साथ इस समय कुछ देर और रहे, क्योंकि समय शिवानी को घर जाने के लिए बुला रहा था और वह उसकी बात ऐसे टाल रही थी जैसे पर्याप्त पैसे ना होने पर कोई असमर्थ जोड़ा अपने बच्चों की बातों को अनसुना करता है । वैसे भी दिन नवम्बर के थे तो अँधेरा जल्दी ही अपने तेवर दिखाने लगा था लेकिन जब ये युगल एक दुसरे को फिर मिलने के वादे के साथ अलग होने लगा तो अँधेरा ऐसे बेबस हो गया जैसे फ़ोन पर बतियाते वक़्त सामने वाले हमारे प्रिय व्यक्ति के द्वारा हमारी कॉल होल्ड पर रख देने के बाद हम हो जाते हैं । सहसा शिवानी टेम्पो से उतर कर लौटी और आयुष के पास आई, कद में थोड़ा सा अंतर होने के कारण उसने किसी रहस्यमयी बात को बताने के लिए आयुष को थोड़ा नीचे झुकने का इशारा किया जैसे वो बताने वाली हो कि मोदी जी का विकास उसे कहीं दिखा था । आयुष झुका रहस्य को सुनने और आशा के विपरीत उसे मिला अपनी प्रेमिका द्वारा पहला चुम्बन जो कि कान को हौले से पकड़कर दिया गया था । शिवानी ने पलटकर जाना चाहा ही था कि आयुष ने उसे हाथ थामकर अपनी ओर खिंचा और प्रेम में मिले इस छोटे से कर्ज़ को तत्काल प्रभाव के साथ अदा कर दिया, जिसमें अपनी प्रेमिका को दिया गया पहला चुम्बन और विदा होते वक़्त दिया जाने वाला आलिंगन था । इसके बाद दोनों अलग हुए और अपने क़दमों को, जो चलने को बिलकुल तैयार नहीं थे जबरन आगे की ओर धकेलने लगे, शिवानी टेम्पो में बैठी और तत्काल टेम्पो ड्राईवर चल दिया मानों वह किसी ट्रेन के ग्रीन सिग्नल की तरह उसका ही इंतज़ार कर रहा था । इंतज़ार वाला इंतज़ार और ना किये जाने वाले इंतज़ार का अंतर समझकर आयुष अपने क़दमों और दिल से लड़ता झगड़ता  अपने रास्ते चल दिया ।।
                                                .....कमलेश.....




रविवार, 15 अक्तूबर 2017

पाँच कवितायें

1. हिंदी -

वर्तमान समय में
मातृभाषा
हिंदी के हालात को देखते हुए,
ऐसा लगता है कि
हमारी भाषा को
अब एक
अदरक वाली,
कड़क
चाय की ज़रूरत है ।
                         

2. तीन, दो, पाँच -

पिछले कुछ समय से,
ऐसा लगता है कि
ज़माना और मैं,
तीन, दो, पाँच खेल रहे हैं ।

हर बार
मैं अपना सेट पूरा करता हूँ,
फिर भी
कुछ ना कुछ उधारी,
ज़माने की बाकी रह ही जाती है ।
                                

3. गुनाह -

गुनहगार
वे लोग नहीं है
जो किसी को धोखा देते हैं,
उन्हें
पिला दी गई होगी,
सिर्फ एक
बेस्वाद चाय ।
                  

4. तुम -

कुछ दिन दूरी पर
रह जाने से तेरे,
हो गया है फिर
इश्क मुझे,
लेकिन इस बार
चाय से ।

परिभाषा लेकिन अब भी
वही है
इश्क की
''तुम''।
                   

5. दुनिया -

सोने के बाद
जागने से पहले
दुनिया मेरी,
तुम होती हो केवल ।

अकस्मात मधुर स्वर तुम्हारे प्रेम का
भेद कर मेरे स्वप्न को,
खींच लेता है
फिर से हकीकत में,
अकिंचन होकर भी जहाँ
तृप्त हो जाता हूँ मैं ।

                   .....कमलेश.....

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

नदी और समंदर

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सालों-साल के अपने
बर्फीले आँगन को छोड़कर,
वो चल पड़ती है
हरियाली साड़ी ओढ़े,
चाँदनी का आलेप लगाए,
चट्टानों का
सुनहरा गहना पहने,
मछलियों का काजल आँजे,
फूलों की लाली
अपने अधरों पर सजाकर,
कल कल करती
पाजेब पहनकर,
हर पड़ाव पर
प्रेम बिखेरती हुई,
अपने प्रियतम के आँगन
पहुंच जाती है,
अपने पिता
पर्वत को विस्मृत कर,
तब सूर्योदय की लालिमा से
अपनी प्रेयसी की
मांग भरकर,
वह उसे
अपने आगोश में समेट लेता है,
और
इस तरह
नदी समंदर में मिल जाती है ।
                                 .....कमलेश.....

रविवार, 17 सितंबर 2017

फिर मैं कविता लिखता हूँ ।


इन अंधियारों के बाहर जाकर
मैं अंधियारों में झांकता हूँ,
उन दरवाजों के भीतर जाकर
मैं दरवाजों में देखता हूँ,
तुम जो चाह रहे हो सुनना
कभी ना तुमसे कहता हूँ,
निकलकर खुद से बाहर
फिर मैं कविता लिखता हूँ |

टूटे हुए को जोड़कर
फिर नए सिरे से चुनता हूँ,
समेटकर बिखरे हुए इंसान  
नित नए खिलोनें बुनता हूँ,
जिनको कर दिया है विलुप्त
तुमने बच्चों के बचपन से,
छीन लिया जिनको तुमने
अपने वजूद के सपनों से,
मत ग्रास करों यूँ इनको
एक बच्चा बन यह कहता हूँ,
पाकर सब कुछ खो देता जब
फिर मैं कविता लिखता हूँ |

तुमको वाजिब लगता है
यूँ उठाना सवाल मेरे शब्दों पर,
पूछता हूँ मैंने कब कहे हैं
कोई शब्द ही अपने कथनों में,
बन चूके ग़ुलाम तुम औरों के
इस क़दर के खुद को भूल गए,
ना देख पाए आईना भी तुम
फिर मुरझाये से फूल हुए,
अब भी नहीं कहता हूँ तुमसे
बस खुद को यह समझाता हूँ,
जुड़ जाता हूँ बिखरकर जब
फिर मैं कविता लिखता हूँ |
                               .....कमलेश.....  

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

बचकानी हरकतें ..........


Source- We Heart It
जब आमजन काम पर निकल चूके होते, सड़कों पर शोरगुल मच रहा होता और सूरज चाचा गुस्सा होने लगते तब कहीं माँ की डाँट और भाईयों के उलाहने सुनकर आशु उठता । बारह बजे अपने घर की बालकनी पर बैठकर नाश्ता करते वक्त उसकी अँगुलियाँ वाटस्एप और फेसबुक पर मार्निंग वाॅक कर रही होती । लेकिन आज मार्निंग वाॅक में खलल पड़ा गली से आती एक प्यारी लेकिन गुस्से भरी आवाज से, एक लड़की जो पास खड़े आॅटो वाले को डाँट रही थी कारण पता नहीं । आशु की निगाह गली में गई तो थी किंतु लौटी नहीं, नज़र चुपचाप उस पीले सूट वाली लड़की के पीछे हो ली जो अब अपनी लटों को चेहरे से हटाकर कानों के पीछे धकेल कर अपने रास्ते पर चल पड़ी थी । अगले दिन आशु थोड़ा वक़्त पर उठकर नाश्ता कर रहा था, लेकिन आज उस बैचेनी में इंतज़ार छुपा हुआ था । कुछ देर बाद वह दिखी एक सात साल के बच्चे के साथ, उसका बस्ता हाथ में लिए और नीले सूट में, अपने होठों पर मुस्कराहट बिखेरती हुई वो उस बच्चे को स्कूल से लेकर घर वापस लौट गई । आशु ने पड़ताल की तो पता चला कि स्कूल ७ से १२ तक चलता है, दो दफ़ा अनजानी सुरत देखने के बाद मचला हुआ दिल प्रत्यक्ष रुप से मिलना चाह रहा था । गुरुवार को जल्दी उठने की नाकाम कोशिश भी की आशु ने जो कि उसे चिड़ा रही थी के "बेटा तुमसे ना हो पायेगा"।
                          आखिरकार दिल की मेहनत चार दिन बाद रंग लायी, सोमवार को जब उसने आँख खुलने पर उसने मोबाइल चेक किया तो वह चौंक गया, ६:१२ मिनट हो रहे थे, वह तैयार होकर स्कूल के लिए निकला । माँ ने देखा तो देखती रह गई, भाई बहन तो लेट उठते थे ; आशु पहुँच गया, मोंटेसरी पब्लिक स्कूल के गेट । कुछ मिनट बाद वह आई महरुन कलर का सूट पहने, आशु की आँखें फटी की फटी रह गयी । लेकिन जैसे वह पास आई आशु बमुश्किल मुस्कुरा पाया, वह आई और बच्चे को छोड़कर छोटी सी स्माइल पास करके निकल गयी ।
                               ११.५२  बजे फिर वो दिखी, आशु इस वक़्त चाय की दुकान पर खड़ा था, एक हाथ में चाय और दुसरे में पारले जी थाम रखा था और उसे देेेखते ही आशु की  टाइमिंग बिगड़ गयी । "टाइमिंग ठीक करने के लिए चाय में बिस्कुट भिगोकर खाना चाहिए ये एक तथ्य है"। उसने आशु को देखा और खिलखिलाते हुए हंसकर चली गई, आशु ने पीछा करने की कोशिश की लेकिन निराशा हाथ लगी । दूर से होने वाली मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा, महिना भर बिता होगा । आज आशु थोड़ा देरी से पहुँचा तो वो उसे हरे रंग के पटियाला सूट में दिखी । आशु ने कुछ कहने की हिम्मत की लेकिन यह सोचकर रुक गया कि बोले क्या ? कुछ देर बाद उसके बोल फूटे "छोटे बच्चों की बचकानी हरक़तें कितनी प्यारी होती है ना !" उसने तिरछी नज़र से देखा और तेजी से चली गई, आशु अपना माथा दिवार से ठोकने के बारे में सोच रहा था कि उसने क्या कह दिया, खैर उसने कुछ दिनों में उसका नाम पता किया "श्रेया", यही नाम था उस लड़की का ।
                         लेकिन चिंता की बात यह थी कि इस दरमियान वो लड़की दिखी नहीं उस स्कूल के आसपास और उसके कई दिन बाद तक भी,आशु ने उम्मीद को ढीला छोड़ दिया था, लेकिन स्कूल जाना नहीं छोड़ा था । एक शुक्रवार वो गेट पर खड़ा था कि पीछे से एक मखमली आवाज़ कानों में पड़ी "वाकई बहुत प्यारी होती है बच्चों की बचकानी हरक़तें ।" आशु पीछे मुड़ा तो अवाक रह गया श्रेया उसके पीछे खड़ी मुस्कुरा रही थी, आशु एकटक उसे देखने लगा तब कुछ देर बाद श्रेया ने माहौल की चुप्पी तोड़ते हुए कहा "चाहने पर ये इस स्कूल के गेट पर सुबह के ७ से दोपहर तक देखी जा सकती है" ।
                       .....कमलेश.....

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

एहसास

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मैं जमाने की भीड़ से बेखबर
तेरे इंतजार में खड़ा हूँ,
सोते जागते हर पल को
बेकरार होकर खड़ा हूँ,
नही चाहता कि मुझे
तेरे सिवा कोई और चाहे,
नही पसंद है कि मेरे सिवा
तुझे देखे किसी की निगाहे,
इक बारिश मुकम्मल हो
तेरी मेरी मोहब्बत के लिए,
कुछ हसरत अधूरी रहे
इक दूजे की तड़प के लिए,
मददगार लगता है मुझको यूँ
अकेले बारिश में भीगना,
बूंदो के छूने मे है वो आनंद
जैसे तुम्हारे लबों को चूमना ।
                         
                          .....कमलेश.....

पहला चुम्बन

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