शनिवार, 24 जून 2017

कल

Source - Youngisthan.In
बीते लम्हो का गट्ठर है ये
आने वाले समय की उम्मीद भी
इक अल्फाज ही नही है केवल
अपनी ही बनाई पहेली है 'कल'।
 
समेटे होता है कभी बुरी यादें
सहेजता है खुबसूरत बात भी
एहसास हमेशा ही दिलाता है
कौन किस राह से गुजरा है
गलतियो का सबक है शायद
आपका एक अनुभव भी है 'कल'।

उम्मीदों का सागर सजाता है कभी
तो कभी ना टूटने वाली आस भी
कुछ करने की उम्मीद जुटाते है
लोग इसके लिए सपने सजाते है
इक हसीन सा लम्हा है शायद
आने वाला हमसफर भी है 'कल'।

ना जानता है कोई सुरत इसकी
फिर भी इसे जीना चाहता है
जिसका मनचाहा हो ना पाया था
वो शख्स इसे भुलाना चाहता है
सब कुछ होकर भी कुछ नही है
आज के गुजरने पर ही आता है 'कल'।
                                                
                                       .....कमलेश.....

मंगलवार, 20 जून 2017

अधूरी ख्वाहिशें


Source - YouTube. Com

हसरत इक बाकी रह गई है
कोशिश कुछ अधूरी छुट गई है
तुम्हारे करीब आकर रूक गया हूँ
ख्वाहिशें ये अधूरी रह गई है ।
 
होंठो से लगाया है तेरी खुशबु को
सीने में छुपाया है तेरी सुरत को
दिल में छुपा रखे है अरमान मैंने
ख्वाबों के सजाये है आसमान मैंने
तेरी साँसो में घुल कर रूक गया मैं
खुद को मिटाने की कोशिश रह गई है
ख्वाहिशें ये अधूरी रह गई है ।
 
रातों की तन्हाई को दुर किया है
तेरे लिए सभी को गैर किया है
चाहा है तुझको इस कदर डुब के
हो गए है चाँद हम ईद के
तुझमें उतर कर रूक गया मैं
तुझमें खोने की बात रह गई है
ख्वाहिशें ये अधूरी रह गई है ।
                                            
                     ....कमलेश.....

गुरुवार, 15 जून 2017

तुम्हें याद है ना ?

Source - Daily Mail
       
                   उस दिन मैं अपने घर वापस आया था कुछ दिन की छुट्टियाँ लेकर , सबसे मिलना जुलना हो चूकने के बाद जब खाना खाने बैठा तब तुम्हारा फोन आया । तुम बहुत नाराज थी क्योंकि मैं इस बार भी तुमसे मिलने नही आ पाया था तुम्हें बहुत देर समझाने के बाद कही जाकर तुम सामान्य हुए वह भी इस वादे के साथ कि वापसी के वक्त तुमसे मिलकर जाऊं । उस बातचीत के बाद मेरे दिन तुम्हारे साथ मुलाकात के सपने देखते हुए कब गुजर गए पता ही नही चला ।
            
               उस रोज शनिवार था मैंने उठकर सबसे पहले तुम्हे फोन किया था ताकि तुमको बता सकूँ के मैं आ रहा हूँ ,तुम कह रही थी के दोपहर तक आ जाना मैं इंतजार करूँगी । मैं उस फोन के बाद काम में इतना उलझ गया था कि तुम्हारे पास आते आते बहुत लेट हो गया था,फिर बस से उतरकर पागलों की तरह भागते हुए तुम तक पहुँचा तो बस स्टॉप की उस बेतरतीब भीड़ में तुम्हें व्यवस्थित और खामोश पाया । तुम्हारी झलक पाते ही जैसे मेरी सारी थकान और उलझनें दूर  हो गई थी , लेकिन तुम शायद थोड़ा नाराज थी और हाँ जायज़ थी तुम्हारी नाराज़गी के तुम्हे दोपहर तक आने की बात कहने के बाद मैं शाम को तुम्हारे पास पहुंचा । याद है जब तुमने मुझसे सवाल करने शुरू किए तब मैं इक बूत की तरह तुम्हारी सूरत को निहार रहा था और फिर तुमने मेरा हाथ थामकर मुझे फिर से वक्त में खींच लिया था क्योंकि मैंने तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब नही दिया था ।
                        समझ नही पा रहा था कि जिससे इन गुजरे दो साल से सिर्फ फोन पर बातचीत की थी उससे मिलकर क्या बात करूंगा, मेरी नज़र तुमसे हट नही पा रही थी और तुम ताने मार रही थी कि फोन पर तो बहुत बाते करते हो अब क्या जुबान नही है । लेकिन  जब तुम्हारे ताने सुनते हुए तुम्हारी आवाज मे थोड़ी नमी महसूस हुई तो मेरा ध्यान टूटा । याद है वो पल जब पहली बार मैंने तुमको छुआ था वो भी आँख पोछने के बहाने और उस पल के बाद हम दोनो कुछ देर के लिए वक्त की बहारो में लिपटकर इक दूजे को थामे हुए थे । मुझे आज भी स्मरण है वो खुबसूरत लम्हा जब तुमने पहली दफा मुझे अपनी बाँहो मे भरकर इस जहान् से दूर कर दिया था, तुम्हे भी याद है, है ना
             उस रोज हम लफ्ज के सहारे बात ही नही कर पाए थे और तुमने चिढ़ाया था कि अगली बार खामोश रहे तो मिलने नही आओगी, उस कटाक्ष मे छुपा वो तुम्हारा निष्कपट प्रेम मैं समझ गया था । क्या तुमको भी हुआ था मेरे प्यार का एहसास ?  मैं भी ना बहुत ही उल्टे सवाल करने लगा हूँ, भूल जाता हूँ कि मुझे अपने गले लगाकर इस बात का जवाब तुमने  बहुत पहले ही दे दिया था ।
                     दो घंटे की उस छोटी लेकिन सबसे हसीन मुलाकात के बाद जब तुमसे विदा लेने का वक्त आया तो बहुत बुरा लग रहा था मुझे और तुम्हारी नासाज़ सूरत भी इसी बात का सबूत थी । हम फिर भी खुश थे कि दो सालों का इंतजार खत्म हो गया था लेकिन अब इस मुलाकात की यादें और ज्यादा सीतम ढाने वाली थी जिनके सहारे जीते हुए हमें अगली मुलाकात का इंतजार करना था।
               शाम के साढ़े सात बजे थे, उस चौराहे पर अधिकांश लोग अपने घर की ओर लौट रहे थे और हमें भी लौटना था, आज से पहले वाली जिंदगी में दिल के करीब होकर भी दुर । जाते वक्त जब तुमने मुड़कर देखा तो ख्याल आया था कि तुम्हारे पहलु में मैं भी हमेशा तुम्हारे हाथ को थामे चलता रहूँ लेकिन यह मुमकिन न था, खैर सारी मजबूरियों को परे रख मैंने  एक बार फिर उसी प्रेम से तुम्हें बाँहो में भरकर और तुम्हारे माथे को चूमकर उस पहली मुलाकात का अविस्मरणीय अंत लिख दिया था, तुम्हे याद है ना ?
    
                                       .....कमलेश.....
                  

शनिवार, 10 जून 2017

इंतजार .... मेरा

   ये कहानी अपने ही देश के एक आम इंसान की है | एक गरीब परिवार में पैदा हुआ लड़का अपने  घर की ज़रूरतों को पूरा करने के साथ अपने लिए भी पैसे कमाता हुआ बड़ा होता है | उसकी ज़िन्दगी के दस साल यूँही गुजरते हैं,अपने
पैसों से किताबें खरीदकर वो कुछ न कुछ पढता रहता था | सौभाग्यवश उसकी मेहनत रंग लाती है और घर के उस बड़े बेटे का चयन भारतीय सेना में हो जाता है |
                   सेना में भर्ती के कुछ दिन बाद ही सीमा पर फायरिंग होती है और कुछ आतंकियों को मौत के घाट उतार वो बेटा देश के लिए शहीद हो जाता है |तब उसकी अंतरात्मा क्या कहती है कुछ पंक्तियों से वो बात आप तक पहुँचाने
की कोशिश की है |




Source- Alamy

वो गाँव का बड़ा चबूतरा,
वो गेहूं के लहलहाते खेत,
वो पुराना सरकारी स्कूल,
अब भी मेरा इंतज़ार कर रहा है |


वो संकरी सी तंग गलियां,
वो कोने वाला हैंडपंप,
वो चौपाल पर बैठी मंडली,
सभी मेरा इंतज़ार कर रहे हैं |


वो बुढा पीपल का पेड़,
वो बाड़े में बंधे जानवर,
वो सूखे भूसे का ढेर,
अब भी मेरा इंतज़ार करता है |


वो नुक्कड़ वाला जर्जर घर,
वो नीम के निचे रखी खाट,
वो बरामदे में कड़ी साइकिल,
आज भी मेरा इंतज़ार कर रही है |


वो रोटियां सेकती मेरी माँ,
वो हल चलाते मेरे पिता,
मुझसे मिलने को बैठा वो भाई,
सब मेरा इंतज़ार ही तो कर रहे हैं |

                              .....कमलेश.....

                                    

सोमवार, 5 जून 2017

धरा की आवाज

    आज इस 4G के युग में हम लोगो ने इस धरती को इतनी बुरी तरीके से तबाह कर दिया है की आने वाले कुछ दशकों में इस धरती से इंसान का वजूद ही ख़त्म हो जायेगा | इस असहनीय पीड़ा को सहते हुए जब इस धरती माँ का दिल दर्द से तड़प उठता है तब वो हम सब से क्या कहती है पढ़िए निचे की कुछ पंक्तियों में ....

 Source - Veterans Today







































मेरा सीना चीर कर प्यास बुझाते हो,
मेरी बांहे काट कर घरोंदे बनाते हो,
क्या होता है वो दर्द
काश तुम कुछ समझ पाते |


खोखला बना दिया है मेरी रूह को,
दिनोंदिन तुम्हारी इन लालसाओं ने,
क्या होता है वो खालीपन
काश तुम कुछ समझ पाते |


मेरे चेहरे को धुंए से ढक दिया,
जिस्म को रसायनों से जला दिया,
क्या होती है वो पीड़ा
काश तुम कुछ समझ पाते |


रंग ही फैला था मुझ पर प्रेम का,
नफरत से तुमने उसे लहू किया है,
क्या होती है ये मोहब्बत
काश तुम कुछ समझ पाते |


मेरा आसमां भी काला पड़ गया है,
जो कभी मेरा आईना हुआ करता था,
क्या होता है वो अपनापन
काश तुम कुछ समझ पाते |


तुम्हारी ज़रूरतों को पूरा करते हुए,
एक दिन मैं भी समाप्त हो जाउंगी,
क्या होती है ये मौत
काश तुम कुछ समझ पाते |

                     
                               .....कमलेश.....

तुमने ( सियासतदार )

Source - Hindustan Times फिर मुस्कराहट को खामोश कर दिया तुमने, फिर एक दिये की लौ को बुझा दिया तुमने । अभी तो यह जहान् देख भी नही...