रविवार, 6 अगस्त 2017

एक ख्वाहिश



Source - Times Bull
दस साल बीत गए
अपना सूना हाथ देखते हुए,
हर मर्तबा सोचता हूँ
किस गुनाह की सजा है ये ?
इस दफा आस है एक खत की
जो 'प्यारे भाई' से शुरू हो,
अपने नसीब में उस प्रेम को
खुद लिखने की हसरत है मेरी ।
इस बंधन की बंदिशे ही
मेरे हाथो को रास आती है,
ऐसा शख्स जिसके होने भर से
किसी की गलतियां छुपती है,
किसी की अनंत शरारतें
तो कभी मोहब्बत भी ।
बिना डरे जिम्मेदारियों को
अपने कंधे पर लेने वाली,
हर बार मेरी ख्वाहिशों को
माँ की तरहा जान लेने वाली,
इक प्यारी सी बहन की वो
राखी मुझे इस साल चाहिए,
खुशनसीब शक्स को ही हासिल वो
प्रेम मुझे इस साल चाहिए ।
                        .....कमलेश.....
 
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